ख्वाहिश ना थी कभी यूँ लिखने की

प्रस्तुत पंक्तियों में कवियत्री दुनियाँ को अपने जज़्बात खुल के बताने की कोशिश कर रही है वह सोचती है कि क्या कभी ऐसा दिन आयेगा जब हर इंसान केवल मानवता का ही धर्म अपनायेगा जब कभी किसी से कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी हर इंसान एक दूसरे को समझ जायेगा।Writing A Poem कवियत्री इस दुनियाँ की भीड़ के गहरे शोर में भी केवल शांति को ढूंढ़ना चाहती है जहाँ कोई किसी से बैर ना रखे सबके दिल में एक दूसरे के प्रति केवल आदर और सम्मान ही हो और सब एक दूसरे की खामियों के लिए एक दूसरे को माफ़ करदे क्योंकि एक ही इंसान में सब कुछ तो नहीं हो सकता है इस दुनियां में आने का सबका अपना अलग मकसद होता है।

अब आप इस कविता का आनंद ले।

ख्वाहिश ना थी कभी यूँ लिखने की,
फिर भी हर रोज़ मैं कुछ ना कुछ लिखती हूँ।
कोई अनोखी प्राणी नहीं,
मैं भी तो औरो के जैसी दिखती हूँ।
जब भी ये भाव मेरे अंदर से ही उमड़ते है।
लिख दूँ जो इन्हे कागज़ पर,
फिर जाकर ये कही सँभलते है।
इस दुनियाँ की भीड़ में ,
ये अँखियाँ केवल शांति ही ढूंढ़ना चाहती है।
अपनी जज़्बातो की कहानी तो हर रोज़,
ये कवियत्री इस दुनियाँ को सुनाती है।
क्या कभी ऐसा पल आयेगा,
जब हर इंसान ही एक दूसरे को चाहेगा।
कोई जैसा भी हो, हर हाल में,
हर इंसान बस मानवता को ही निभायेगा।
हर इंसान ही तो यहाँ अनोखा है.
फिर क्यों यहाँ सबके विचार टकराते है?
कोई तो कह कर भी नहीं समझता,
तो कोई हमारी आखियो को पढ़ कर ही,
हमे समझ जाते है।

धन्यवाद।

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