मेरे प्रिय बुद्धा

प्रस्तुत पंक्तियों में कवियत्री अपना प्यार अपने ईश्वर(बुद्धा) के प्रति ज़ाहिर कर रही है। इन पंक्तियों के ज़रिये वह दुनियाँ को यह बताना चाहती है की ईश्वर दुनियाँ के कर्ण -कर्ण में बस्ते है वह पूरी मानव जाती पशु व पक्षी के हृदय में वास करते है बस कुछ लोग इस बात को समझते है और कुछ उन्हें अपने से बहार ढूंढ़ते है। Budhaहमारे अंदर की पॉजिटिव एनर्जी ही हमारे ईश्वर है। लेकिन हम पॉजिटिव हमेशा नहीं रह पाते क्योंकि पॉजिटिव और नेगेटिव दोनों ही एनर्जी हमारे ही अंदर है। सही तरह से साधना कर पॉजिटिव एनर्जी को जगाया जा सकता है।लेकिन ये कार्य दुनियाँ का सबसे मुश्किल कार्य है जो केवल कुछ लोग ही कर पाये। इसलिए उन लोगो की जितनी भी तारीफ करी जाये उतनी कम है।

अब आप इस कविता का आनंद ले।

फूलो की बारिश थी और लगा था मेला,
उस भीड़ की चाँदनी में भी, ये दिल का मेरा कितना अकेला।
नज़र घुमाई और अपने हाथ में देखा,
तुम्हे पाने की, मेरे हाथो में भी है रेखा।
आंखे बंद करी जो उस भीड़ में भी तो, तुम ही तुम नज़र आये।
तुम्हारे रूप की छवि मुझे ही नहीं, सबके मन को है भाये।
कमल के फूल पर, तुम्हारी छवि शांत बैठी दिखती है।
तुम्हे पहचान तुम्हारे हक़ में, ये कवियत्री हर रोज़ तुम्हारी बताई बातें लिखती है।
लाखो मूरते है तुम्हारी, जो बाज़ारो में यूही बिकती है।
मूर्तिया है भले ही लाखो, पर सच में तो तुम हम सबके अंदर बस्ते हो।
हमारी नादानियों को देख, क्या तुम भी हम पर हस्ते हो?
किसे बताऊ अपने मन की व्यथा,
एक तुम ही तो हो जो मुझे पढ़ सकते हो।
मुझमे रहकर जीवन के हर पड़ाव में मुझे सही दिशा दिखाना।
थक कर सो भी जाऊ, जो ज़िन्दगी की मुश्किलों में,
तो तुम ही मुझे प्यार से जगाना।

धन्यवाद।

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