सुप्रीम कोर्ट धारा 377 पर पुनर्विचार के लिए तैयार

गुजरात के राज पिपला परिवार के राजकुमार मानवेंद्र गोहील को 2006 में उनके परिवार ने निष्कासित कर दिया था। उनका दोष यह था की राजकुमार गोहील ने स्वयं को ‘गे’ घोषित कर दिया था। इस घोषणा के बार राजपरिवार ने राजकुमार के समस्त अधिकारों से उन्हें वंचित करके उन्हें पूर्णतया बहिष्कृत कर दिया था। यह बहिष्करण उस मान्यता का परिणाम है जिसके अंतर्गत भारतीय समाज में समलैंगिगता को सख्त दंडनीय अपराध माना जाता है।Dhara 377धारा 377 :

भारतीय संविधान की धारा 377 के अनुसार दो समान लिंग वाले वयस्क व्यक्तियों के बीच आपसी सम्बन्धों और सहमति से बनाए सम्बन्धों को दंडनीय अपराध की श्रेणी में रखा गया है। यदि अपराध सिद्ध हो जाता है तो संबंधी व्यक्तियों को दस वर्ष तक की सज़ा या उम्रक़ैद की सज़ा हो सकती है। इस धारा के अनुसार यदि कोई व्यक्ति समान लिंग के व्यक्ति, महिला या जानवर के साथ संबद्ध बनाता है तो उसे ‘आप्रकृतिक सम्बन्धों’ की श्रेणी में रखा जाएगा। भारत के संविधान में यह कानून ब्रिटिश राज से 1861 से चलता चला आ रहा है।

धारा का विरोध:

समाज में जो लोग समलैंगिक समाज और उनसे जुड़े मुद्दों पर काम करते हैं उनका मानना है की कानून की यह धारा लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन करती है। अपने कथन को स्पष्ट करते हुए यह लोग तर्क देते हैं की किसी भी व्यक्ति को उसके सेक्सुशेयल ओरिएंटेशन के लिए दंडित करना, उसके मानवीय अधिकारों का हनन करना होता है।

इस तर्क को वर्ष 2016 में भारत की सुप्रीम कोर्ट ने भी माना था। कोर्ट का माना है की किसी भी व्यक्ति का सेकशुयल ओरिएंटेशन पूरी तरह से उसका व्यक्तिगत मामला है जिसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है। इस तर्क के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट का कहना है की व्यक्ति की निजता का अधिकार उसके मौलिक अधिकार में माना जाता है। यह अधिकार संविधान के “राइट तो लाइफ एंड लिबर्टी” का पूरी तरह से हनन माना जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला:

सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बैंच संविधान की धारा 377 पर पुनर्विचार के लिए राजी हो गई है। यही नहीं बल्कि जजों की इस बेंच ने यह विचार संविधान पीठ के विचार हेतु भी आगे भेज दिया है। दरअसल कोर्ट को एलजीबीटी (लेसबियन, गे, बाईसेकशुअल और ट्रांस जेंडर) समुदाय के पाँच लोगों की याचिका के जवाब में यह कदम उठाना पड़ा है। इन लोगों का कहना है की संविधान की धारा 377 के अनुसार उन्हें अपने सेकशुयल ओरिएंटेशन के कारण हमेशा समाज और पुलिस का डर बना रहता है। यह उनके निजी और मौलिक अधिकारों का हनन है।

धारा 377 और राजनीति :

अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की अध्यक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का जोरदार स्वागत किया है। उनका मानना है कि समाज में हर व्यक्ति को अपनी इच्छा से जीने का अधिकार है। कांग्रेस की महिला नेता का मानना है कि सभी राजनीतिक पार्टियों को इक्कीसवीं सदी का प्रतिनिधित्व करते हुए निजी सम्बन्धों पर चुप्पी नहीं रखनी चाहिए।

दिल्ली हाईकोर्ट:

कुछ समय पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने उस फैसले को रद्द कर दिया था जिसमें दो व्यसकों के बीच बने समलैंगिक सम्बन्धों को अपराध माना गया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस फैसले को फिर से रद्द करते हुए इस प्रकार के सम्बन्धों को अवैध करार दे दिया गया था।

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