कहीं सुरेश बाबू के पास इंजीनियरिंग की डिग्री जाली तो नहीं

जी हाँ, आपकी जानकारी में यदि कोई युवा इंजीनियर हैं तो उनकी डिग्री के बारे में पता कर लें की वो कहीं उस संस्थान से तो नहीं ली गई जिसे सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया है।supreme courtअभी कल के आदेश से भारतीय युवा सम्हल भी नहीं पाया था की आज सुप्रीम कोर्ट ने एक नया वार और कर दिया। आज के आदेश से उन सभी युवाओं के भविष्य पर सवाल खड़ा कर दिया है जो इंजीनियर बन कर अपनी नौकरी में खुश थे। शुक्रवार 3 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश के अंतर्गत 2018-19 से हर प्रकार के तकनीकी पाठ्यक्रम को पत्राचार माध्यम से करने पर रोक लगा दी थी। इसी आदेश की पूरी व्याख्या आने पर पता लगा की सुप्रीम कोर्ट के फैसले में तकनीकी कोर्स पर रोक ही नहीं है बल्कि डिम्म्ड़ युनिवर्सिटियों द्वारा दी गई इंजीनियरिंग की डिग्री को भी रद्द कर दिया है। इसके प्रभाव से वो हजारों छात्र प्रभावित हो गए हैं जिनके पास यह डिग्रियाँ हैं और वो उसी के आधार पर नौकरी कर रहे हैं।

क्या है यह नया वार:

3 नवंबर 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश जारी किया जिसमें यह स्पष्ट किया गया की देश का कोई भी डिम्म्ड़ विश्वविद्यालय 2018-19 के सत्र में बिना नियामक प्राधिकार के कोई भी डिस्टेन्स लर्निंग कार्यक्रम चला सकता है।

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इसके साथ ही चार डिम्म्ड़ यूनिवर्सिटी की 2001-05 के बाद डिस्टेन्स लर्निंग के माध्यम से करी हुई इंजीनियरिंग की डिग्री को भी निरस्त कर दिया है। ये चार यूनिवर्सिटी हैं इलाहाबाद एग्रीकल्चर इंस्टीट्यूट, जेआरएन राजस्थान विद्यापीठ (उदयपुर), इंस्टीट्यूट ऑफ एड्वान्स्ड़ स्टडीज़ (राजस्थान) और विनयक मिशन रिसर्च फाउंडेशन (तमिलनाडु) हैं।

क्यूँ गिरी गाज :

दरअसल इन चारों विश्वविद्यालयों ने इंजीनियरिंग के अध्यापन के लिए संबंधी प्राधिकरण से नियमित अनुमति नहीं ली थी। इसके बावजूद 2001-2005 की अवधि में इन सभी संस्थानों के उन सभी छात्रों को थोड़ी सुविधा भी दी गई है क्यूंकी इन्होनें अधिकारियों की लापरवाही का नतीजा भुगता है। सुप्रीम कोर्ट ने उन सभी अधिकारियों की पृष्ठभूमि को सीबीआई के द्वारा जाँचने का आदेश दिया है जिन्होनें न्यायिक आदेश की अवहेलना करते हुए छात्रों को इंजीनियरिंग पढ़ाई का मौका दिया । इसके अतिरिक्त तीन प्रसिद्ध लोगों की एक समिति का गठन भी किया गया है जो यूनिवर्सिटी की उच्च शिक्षा के स्तर की जांच करेंगे।

क्या हो सकता है:

सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी प्रभावित छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखकर एक मौका देने का फैसला किया है। इन सभी छात्रों को एयाइसिटीई द्वारा आयोजित एक परीक्षा देनी होगी। जो छात्र इस परीक्षा को उत्तीर्ण कर लेंगे उन्हीं की डिग्री मान्य होगी। इन चारों यूनिवर्सिटीयों को सभी छात्रों से ली गई फीस और दूसरे शुल्क के रूप में ली गई धन राशि भी वापस करनी होगी।

लेकिन वो छात्र जिन्होनें 2005 के बाद इन संस्थानों में तकनीकी पाठ्यक्रम के लिए डिस्टेन्स लर्निंग में प्रवेश लिया था, उन्हें कोर्ट की तरफ से किसी प्रकार की सहानुभूति नहीं मिली है। कोर्ट का मानना है की इन छात्रों ने यह जानते हुए भी की यह कोर्स मान्य नहीं है तब भी प्रवेश लिया है इसलिए वो किसी सहायता के अधिकारी नहीं हैं।

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