शुक्र है लोहड़ी पर नहीं हुई किसी की दखलअंदाजी

भारत में आए दिन छोटी और बड़ी बातों को लेकर दखलंदाजी करना आम बात बन गई है खासतौर से जब बात दिल्ली की हो. भारत की राजधानी दिल्ली में प्रदूषण एक बहुत बड़ी समस्या है और यह समस्या और भी ज्यादा गंभीर बन जाती है जब दिवाली अपनी दस्तक देती है. क्योंकि भारी मात्रा में फोड़े जाने वाले पटाखे कुछ ज्यादा ही प्रदूषण पैदा कर जाते हैं जो महीनों तक काबू नहीं हो पाता और तरह तरह के नियम कानून बनाए जाते हैं जिनसे प्रदूषण पर काबू पाया जा सके..कानून में यह तक होता है कि आप दिवाली पर पटाखे नहीं पढ़ सकते जो प्रदूषण के लिए बहुत सही है मगर शुक्र है कि लोहड़ी पर किसी ने दखलंदाजी नहीं की है क्योंकि लोहड़ी पर भी भारी मात्रा में लकड़ियां जलाई जाती हैं जो प्रदूषण को पैदा करती हैं मगर इस समय दिल्ली के अंदर प्रदूषण काफी हद तक काबू में है और लकड़ियों से पैदा होने वाला प्रदूषण जल्द ही समाप्त भी हो जाता है.

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मगर इसका यह मतलब नहीं अगर लोहड़ी पर किसी की दखलंदाजी नहीं हुई है तो आप भी पर्यावरण का और प्रदूषण का ध्यान ना रखें. आप लोहड़ी को बहुत अच्छे से मनाइये मगर साथ ही प्रदूषण का ख्याल भी रखें ताकि आपको बाहर निकलने पर हर समय मास्क की जरूरत ना पड़े.

क्यों मनाई जाती है लोहड़ी

पुरानी मान्यताओं के अनुसार इस पर्व का काफी महत्व है क्योंकि बड़े बुजुर्गों के साथ नई पीढ़ी को पुरानी मान्यताओं और रीति-रिवाजों का ज्ञान हासिल करने का यह सुनहरा मौका मिलता है ताकि भविष्य में पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह उत्सव चलता रहे और बुजुर्गों से रीति रिवाजों का ज्ञान नई पीढ़ी को मिलता रहे.

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इतना ही नहीं ऐसा माना जाता है कि जिस घर में नई शादी हुई होती है, शादी की पहली वर्षगांठ होती है या संतान का जन्म हुआ होता है तो लोहड़ी मनाने का मजा और ज्यादा हो जाता है. साथ ही लोहडी के दिन कुंवारी लड़कियां रंग-बिरंगे और नए नए कपड़े पहन कर घर जा जाकर लोहड़ी मांगती है तथा शाम को आग जलाकर सभी बूढ़े बच्चे एक स्वर में ताल से ताल मिला कर लोहड़ी के गीत भी गाते हैं और भांगड़ा तक किया जाता है.

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